Thursday, June 11

एक दशक पहले की बात है| पानी के मामले में पिछले साल एक घटना ने पूरे देश को झकझोरा| घटना थी महाराष्ट्र के लातूर शहर में पानी की बदहाली की| नजारा पूरे देश ने देखा| आम लोग और नागरिक संगठन चेते भी, लेकिन सरकारें शायद नहीं|

लेकिन नागरिकों में कुछ लोग जागरुक भी होते हैं और भले बुरे की परवाह भी करते हैं| कानपुर के एक संगठन ने तो शहर की स्थानीय संसद यानि कानपुर नगर निगम के ठीक सामने लिखा “वो दिन नहीं दूर, जब कानपुर होगा लातूर”| डेढ़ सौ फीट की दीवार पर लिखे इस सन्देश से नगर निगम के आला अधिकारियों के माथे पर पसीना तो आ गया| बहुत हायतौबा हुई| लेकिन असल जिम्मेदार दूर से तमाशबीन बने रहे| कानपुर विकास प्राधिकरण रेन वाटर हार्वेस्टिंग की नोडल एजेंसी थी| जिम्मेदार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी| ये एक सामान्य अनदेखी नहीं है| इसी अनदेखी का नतीजा है कि पूरा शहर हर साल पानी की किल्लत से रूबरू होता है| बात सिर्फ पुरानी बसावट तक नहीं| विकास प्राधिकरण विभाग शहर के विस्तार के लिए योजनायें बनाता है| मगर शहर के पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण की जमीन पर बस रही नयी कालोनियों को कितने दिन तक पानी मिलेगा इस बात की गारंटी कोई नहीं लेता|

सच तो ये हैं कि पानी की बंदोबस्ती का जिम्मा आवास और नगर नियोजन मंत्रालय और नगर विकास मंत्रालय ने साझे तौर पर उठाया है| लेकिन वर्षा जल संचयन के सवाल पर नगर नियोजन में लगे आला अधिकारी भी बगलें झांकते पाए जाते हैं| 

किसी से छिपा नहीं है कि अनियंत्रित दोहन, बेहिसाब प्रदूषण और पारिस्थितिकीय असंतुलन के चलते भूगर्भ जल की हालत कितनी गंभीर हो चुकी है| यह मामला है जिसमे लम्बे समय के प्रबंधन और योजनाकारी की जरुरत है| तभी भूगर्भ जल के दोहन पर नियंत्रण, भूगर्भ जल के संरक्षण, वर्षा जल संचयन के लिए बनी योजनायें भी प्रभावशाली हो सकेंगी| इसके लिए वर्ष 2004 में पारित एक आदेश में राज्य के भूगर्भ जल विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया|

सरकारी दस्तावेजों की मानें तो भूगर्भ जल के लिए वर्षा जल संचयन, भूगर्भ जल के पुनर्जीवन और जल स्रोतों के प्रबंधन बनी योजनायें सरकारों की सर्वोच्च प्राथमिकता में शुमार रही हैं| लेकिन रोना इस बात का है कि कोई ठोस कार्य नहीं हो सके| भूगर्भ जल विकास और बेहिसाब दोहन की बजाए भूगर्भ जल प्रबंधन मुकम्मल हो इसके लिए बारहवीं पंचवर्षीय योजना में चिरस्थायी भूगर्भ जल प्रबंधन का प्रावधान शामिल किया गया| योजना आयोग की रिपोर्ट में पूरे देश के लिए भूगर्भ जल प्रबंधन कार्यक्रम घोषित किया गया|

केंद्र की इस पहल पर राज्यों को दायित्व दिया गया कि वे अपनी समग्र भूगर्भ जल प्रबंधन नीति बनायें| अखिलेश यादव सरकार की ताजपोशी के साथ ही प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक मे समग्र भूगर्भ जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और भूगर्भ जल स्रोतों के पुनर्जीवन की नीति की जरुरत तय हुई| उसी के मुताबिक प्रमुख सचिव के आदेश में राज्य के भूगर्भ जल विभाग को जिम्मेदारी मिली कि वे समग्र भूगर्भ जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और भूगर्भ जल स्रोतों के पुनर्जीवन की नीति और कार्य योजना बनाएं| साथ ही यह भी निर्देश हुआ कि इस सन्दर्भ में सभी विभाग राज्य भूगर्भ जल विभाग का सहयोग करें|

सरकार की मानें तो सिंचाई, पेयजल और उद्योग क्षेत्र की प्रमुख निर्भरता भूगर्भ जल की ही है| सिंचाई की 70 प्रतिशत, पेयजल की 80 प्रतिशत और औद्योगिक उपभोग की 85 प्रतिशत जरूरतें भूगर्भ जल से ही पूरी होती हैं| नतीजन भूगर्भ जल का जो दोहन वर्ष 2000 में 54.31 प्रतिशत था  वह बढ़ कर वर्ष 2009 में 72.16 प्रतिशत हो गया| इसके पीछे लघु सिंचाई विभाग के चौंकाने वाले आंकड़े हैं| पूरे प्रदेश में इकतालीस लाख छोटे, पच्चीस हजार से ज्यादा मझले इतनी ही मात्रा में गहरे नलकूप जल दोहन करते हैं| लगभग तीस हजार नलकूप राज्य सरकार के हैं वो अलग| चार इंच से लेकर बारह इंच की पाइपलाइन वाले इन नलकूपों से हो रहा जलदोहन भूगर्भ जल वैज्ञानिकों के लिए गंभीर चिंता की बात है| पेयजल योजनाओं में पांच सौ बीस करोड़ लीटर से ज्यादा पानी रोजाना खींचा जाता है जिनसे प्रदेश के छः सौ तीस शहरी क्षेत्रों की प्यास बुझती है| ग्रामीण इलाकों में रोजाना के जलदोहन का यह आंकड़ा आठ सौ करोड़ लीटर पार कर जाता है| इसका नतीजा बताते हैं सरकारी दस्तावेज जिसके मुताबिक आठ सौ बीस विकास क्षेत्रों में से छः सौ तीस विकास क्षेत्रों में भूगर्भ जल का स्तर गिरा है जिनकी स्थिति चिंताजनक हैं| आठ साल पहले 2009 में किये गए एक आकलन में ऐसे छिहत्तर विकास खण्डों में भूगर्भ जल की स्थिति गंभीर बताई गई, बत्तीस की हालत बेहद नाजुक और एक सौ सात विकास खण्डों के भूगर्भ जल की हालत भयावह बताई गयी| जबकि वर्ष 2000 में हुए सर्वेक्षण में मात्र बीस विकास खण्डों के भूगर्भ जल की हालत चिंताजनक पायी गयी थी|

शहरों में भूगर्भ जल और बुरा हाल है, सभी बड़े शहरों में भूगर्भ जल की गिरावट का औसत चालीस  सेंटीमीटर से एक मीटर का है| मेरठ में 91, ग़ाज़ियाबाद में 79, गौतमबुद्ध नगर में 76, लखनऊ में 70, वाराणसी में 68, कानपुर में 65, इलाहाबाद में 62, और आगरा में 45 सेंटीमीटर की औसत गिरावट सालाना दर्ज की जा रही है| नतीजन शहरी और ग्रामीण इलाकों में लाखों इण्डिया मार्का हैण्ड पंप सूखे खड़े हैं| यह संसाधनों का रोना रोने वाली सरकारी रवायत के लिए शर्मिंदगी वाली बात भी है| लाखों हैण्ड पम्पों के मद में हुआ खर्च सरकारी संसाधनों की बरबादी के साथ ही साथ विकास के नाम पर सरकार के लोगों का अदूरदर्शी रवैया भी बयान करता है| जमीन के भीतर मौजूद पानी में रूपया कैसे डुबोया जाता है इसकी एक और मिसाल मिलती है निजी और छोटे नलकूपों के मामले में| डूडा सरीखे संस्थानों में सालाना लक्ष्य निर्धारित करके धन आवंटित होता है| मगर नलकूप बनाने के लिए मिला रूपया कहाँ लगा इसकी तस्दीक करनी बहुत मुश्किल है| ये तो है भौतिक सत्यापन का हाल| जिस अनुपात में नलकूप लगा कर जमीन से पानी खींचने की कवायदें परवान चढ़ रही हैं उस अनुपात में जमीन के भीतर पानी पहुंचाने की योजनायें भी बन रही हैं| लेकिन योजनाओं की सच्चाई में लक्ष्य तो दूर विभागों के दफ्तर और कर्मचारी खस्ताहाल हैं|      

भूगर्भ जल आधारित पेयजल सप्लाई की अव्यवस्था की एक नजीर ये भी है कि पाइपलाइन सप्लाई का लगभग चालीस प्रतिशत पेयजल लीकेज में बर्बाद जाता है| यह बिजली और पानी दोनों की इस बेहिसाब बरबादी है| इस मसले पर मीडिया में भी बहुत कुछ कहा गया| लेकिन तमाम कहने सुनने के बावजूद नतीजे ढाक के तीन पात वाले ही हैं| न तो सरकार लोगों को इतनी फिक्रमंदी है कि गाँव और शहरों को पानीदार बना कर आबाद करें और न ही इतने पानीदार लोग बचे हैं जिनकी कवायदें कोई करामात दिखा सकें| क्योंकि मामलों को सतही तौर पर देखने वालों के लिए बरसात होते ही सब हरा-हरा दिखाई देने लगता है, और सारी फाइलें लम्बे समय के लिए ठन्डे बस्ते में चली जाती हैं| इस रवैये के साथ राजकाज का हासिल क्या होगा इसका अंदाजा भी भयानक नजर आता है| कहने को तो चेरापूंजी सबसे ज्यादा बारिश वाला क्षेत्र है, लेकिन एक सच ये भी है कि वहां भी पीने का पानी वर्षा जल संचयन से ही मिल पाता है|

सामाजिक संगठन गंगा एलायंस से लोग कहते हैं कि भारत सबसे ज्यादा नदियों का देश है, लेकिन नदियाँ सूख रही हैं| जमीन की जान है पानी, देश का स्वाभिमान है पानी| अगर पानी नहीं हो तो जमीन किस काम की? पानी पर सरकारी कवायदों को जमीन की तरह ठोस और पानी की तरह कोमल और पारदर्शी होने की जरुरत है| पानी की तासीर बूँद-बूँद जोड़कर धार बना लेने की होती है| यह बूँद-बूँद का जुड़ना ही सहयोग है और धार बनकर प्रवाहित होना निरंतरता| अगर इतना हो जाता है तो सरकारी योजनाओं में भी लोग जुड़ना चाहेंगे| राज और समाज के सतत और समग्र प्रयासों से ही जमीन और पानी की बदहाली ठीक हो पायेगी| तभी नदियों का लोड भी कम हो सकेगा और अविरलता की बात संभव और साकार हो पायेगी| बारिश के पानी से आत्म निर्भरता हासिल हो सकेगी तभी “जल स्वराज” का सपना साकार हो पायेगा|

राकेश मिश्र

लेखक गंगा एलायंस के “जल स्वराज” से जुड़े हैं|

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